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विधान सभा में प्रश्न सही होगा तो जवाब भी सटीक आयेगा -श्री तोमर
पश्चिम बंगाल विधान सभा में नए विधायकों का प्रबोधन कार्यक्रम
भोपाल/कोलकाता, 3 जुलाई 2026
प्रश्नकाल में सभी सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि कैसी भी परिस्थिति हो लेकिन प्रश्नकाल को स्थगित नहीं करना चाहिए। कई बार प्रश्नकाल में पूरक प्रश्न में एक-दो मिनट तो भाषण में ही निकाल देते हैं। इससे समय भी जाया होता है और प्रश्न भी कई बार घूम जाता है। जब प्रश्न घूम जाता है तो सरकार का जवाब भी घूम जाता है। अगर सरकार से ठीक जवाब लेना है या सरकार को कटघरे में खड़ा करना है तो पूरक प्रश्न सटीक होना चाहिए। इसके लिए निश्चित रूप से विधायकों को प्रश्न के बारे में अध्ययन करना चाहिए। प्रश्न की सार्थकता विधायक की प्रतिष्ठा भी है। इसलिए प्रश्न संक्षिप्त और सार्थक हो। प्रश्न सार्थक होगा और पूरक प्रश्न सीधा व सटीक होगा तो जवाब भी सटीक आएगा और अगर सरकार के पास जवाब नहीं होगा तो सरकार निरुत्तर होगी। अगर सार्थक जवाब आएगा तो आपके कार्य की प्रशंसा होगी। इसलिए प्रश्नकाल का उपयोग हम सब लोगों को बहुत ही ध्यान पूर्वक और अच्छे तरीके से करना चाहिए।
यह बात मध्यप्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कही। वे पश्चिम बंगाल विधान सभा में नए विधायकों का प्रबोधन कार्यक्रम में "सरकार की जवाबदेही तय करने के लिए संसदीय प्रश्न एवं अन्य संसदीय उपकरणों की महत्ता" विषय पर बोल रहे थे। कार्यक्रम में लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश एवं विभिन्न राज्यों से आए पीठासीन अधिकारी, लोकसभा व विधान सभाओं के अधिकारी उपस्थित थे।
विधान सभा की कार्यवाही में भागीदारी के संबध में चर्चा करते हुए श्री तोमर ने कहा कि विधान सभा का सत्र प्रारंभ होने के पहले क्षेत्र में भ्रमण भी होना चाहिए। अगर क्षेत्र में भ्रमण करेंगे तो समस्या से सही रूप में रूबरू होंगे। कई बार लोग हमको प्रश्न बना कर दे देते हैं। हमको भी लगता है कि प्रश्न लगाना है और बने बनाए प्रश्न मिल गए हैं तो क्यों मेहनत करें? लेकिन प्रश्न को हमें अपने हाथ से लिखना चाहिए। किसी ने चाहे कितना भी अच्छा प्रश्न लिख कर दिया हो प्रश्न हम अपने हाथ से लिखेंगे तो उसे प्रश्न के प्राण, उस की आत्मा को समझ पाएंगे। यह भी समझ आएगा कि प्रश्न किसी गलत दृष्टिकोण के आधार पर ड्राफ्ट किया गया है तो आप या तो उसे पूछोगे नहीं या उसको सही करके लगाओगे। यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि प्रश्न व्यक्ति विशेष पर केंद्रित न हो। जब व्यक्ति विशेष पर प्रश्न केंद्रित होता है तो फिर उसके गलत अर्थ भी निकलते हैं। गलत अर्थ पर जब चर्चा होती है तो विधायक की प्रतिष्ठा धूमिल होती है।
श्री तोमर ने कहा कि ध्यानाकर्षण लगाते समय भी हम सब लोगों को इसके पीछे की भावना पर ध्यान देना चाहिए अन्यथा इसका महत्व कम हो जाएगा। विषय महत्वपूर्ण होगा तो ध्यानाकर्षण लगते ही पूरी सरकार में खलबली मच जाएगी। काम रोको प्रस्ताव भी एक बड़ा साधन है। इसका भी समय-समय का प्रयोग करना चाहिए।
श्री तोमर ने कहा कि जिस व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन जनता सुनिश्चित कर देती है उसके लिए व्यक्तिगत कुछ नहीं होता है। उसके लिए सार्वजनिक जीवन ही सबसे अधिक महत्व का होता है। व्यक्तिगत जीवन की शुद्धता ही सार्वजनिक जीवन की शुद्धता को सार्थक करती है। इसलिए हमारा व्यक्तिगत जीवन भी अच्छा हो तो सार्वजनिक जीवन भी अच्छा होगा और सार्वजनिक जीवन अच्छा होगा तो हम जन अपेक्षाओं के अनुरूप काम करने में सफल होंगे। विधान सभा केवल संसदीय कार्यवाही का विवरण नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस जीवंत व्यवस्था का प्रतिपादन है, जहाँ सत्ता अपने आप में अंतिम नहीं होती, बल्कि हर क्षण परीक्षण के अधीन रहती है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ यही है कि शासन शक्ति के साथ-साथ उत्तरदायित्व भी लेकर चलता है, और यह उत्तरदायित्व केवल नैतिक नहीं, बल्कि संस्थागत होता है।
श्री तोमर ने कहा कि जब भी लोकतंत्र, राष्ट्रनिर्माण और जनसेवा की बात होती है, तब पश्चिम बंगाल का योगदान सदैव अग्रणी रहा है। इस पवित्र भूमि ने रामकृष्ण परमहंस, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद, श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे मनीषियों को जन्म दिया है। इनकी विरासत हमें यह प्रेरणा देती है कि सार्वजनिक जीवन का सर्वोच्य उद्देश्य व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज की निःस्वार्थ सेवा होना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार को अधिकार जनता देती है, लेकिन उसी अधिकार के साथ यह भी अपेक्षा होती है कि सरकार हर निर्णय के लिए उत्तर देगी, हर नीति की व्याख्या करेगी और हर व्यय का औचित्य सिद्ध करेगी। यह कार्य किसी एक व्यवस्था से संभव नहीं होता, बल्कि एक पूरी संसदीय संरचना के माध्यम से होता है, जिसमें प्रश्नों की शक्ति, चर्चाओं की गहराई, समितियों की सूक्ष्म जांच और वित्तीय नियंत्रण की कठोरता शामिल होती है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना हमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के जिन आदशों की प्रेरणा देती है, उन्हें व्यवहार में उतारने का सबसे प्रभावी मंच विधानमंडल ही है। लोकतंत्र की सफलता केवल संविधान में लिखे गए शब्दों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उन संस्थाओं पर निर्भर करती है जो संविधान की भावना को जीवित रखती हैं।
श्री तोमर ने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात में है कि यहाँ कोई भी निर्णय अंतिम नहीं होता, कोई भी सत्ता बिना प्रश्नों के नहीं चलती, और कोई भी नीति बिना समीक्षा के स्वीकार नहीं होती। यही वह व्यवस्था है जो शासन को पारदर्शी बनाती है, संस्थाओं को मजबूत करती है और जनता के विश्वास को स्थायी बनाती है। संसदीय उपकरण केवल प्रक्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि वे लोकतंत्र की आत्मा हैं-जो सत्ता को शक्ति भी देते हैं और उसी शक्ति को उत्तरदायित्व की सीमा में भी बाँधते हैं। यही संतुलन लोकतंत्र को जीवंत, मजबूत और जनहितकारी बनाता है।
प्रबोधन कार्यक्रम में मध्यप्रदेश विधान सभा के प्रमुख सचिव श्री अरविंद शर्मा भी भाग लेने पहुंचे हैं।
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